Friday, 8 June 2018

समुद्र



कुछ लेकर कुछ देने वाले
तो बहुत मिले |
कुछ देकर, बदले में
लेने वाले भी
बहुत मिले |
पर सिर्फ देने वाला ---
`ईश्वर` के अतिरिक्त,
बस एक ही देखा |
वह देता ही रहता है |
बिन माँगे तो देता ही है,
मांगो तब भी झोली भरता है |
उसकी आती लहरें, छोड़ जाती हैं तट पर,
सीपियाँ और बहुमूल्य रत्न और पत्थर |
मानो तो वह भी ---
ईश्वर ही है, शायद
जीवन – दाता भी उसे जानो |
कहते हैं – समुद्र या सागर भी उसे
मतभेद मिटा देता है समस्त
जब बहता – जोड़ता देश – विदेश |
उसके तल में धन की खान,
उसके तल में जीवन – प्राण
क्षार देता स्वाद हमें
मोती से बनता आभूषण |
‘समुद्र देवता’ – कहना
अतिशयोक्ति नहीं,
गर सागर हो शांत |
पर ‘दावानल’ बना देती
है उसे ---
पृथ्वी की तीव्र हलचल,
और कर देती है उसे अशांत |
जीवन – लीला के विनाश में फिर,
सागर हो जाता है बदनाम,
पर ----
फिर से जीवन बसाने में भी
फिर से वही आता है काम |
उसकी उठती – गिरती लहरों में,
हम देख सकते हैं –
जीवन के उतार – चढ़ाव,
फिर भी बहते रहना, ही है
जीवन को जीते जाना |
यहाँ भी सागर सिखा गया हमें
‘सलीका’, जीवन जीने का
इस तरह कुछ लिए बिना ही
फिर कुछ ‘दे’ गया सागर |
- मधु रानी
मार्च 2015

Thursday, 8 March 2018

कहां जा रही है यह पीढ़ी?


एक क्षण ऐसा भी
जीवन में मेरे आया
जब मजबूर हूं सोचने पर
कहां जा रही है यह पीढ़ी?

वाकया बारहवीं बोर्ड परीक्षा-कक्ष की
मैं नियुक्त थी वीक्षक के रूप में
एक अति सुंदर बाला परीक्षार्थी ने
बरबस ध्यान खींचा मेरा ।

वह बाला जैसे आयी हो
सौंदर्य प्रतियोगिता जीतने
ओष्ठ-लाली से नख-लाली तक
सजी ऐसे जैसे दुल्हन हो कोई ।
       
केश -- सज्जा, नयनों में काजल
पहनावा चुस्त, लड़कों सदृश्य
तिस पर बातें करती रही
ताक -- झांक भी इधर -- उधर ।

टोका मैंने तो आंखें दिखाती
मुझसे ही लगी उलझने
मुंह लगाना मैं ठीक न समझी
अपने कार्य में रही मगन ।

पकड़ी गई थी वह
पहले दिन भी
कक्ष में प्रवेश करने वक़्त
मेरे द्वारा ही ।
       
इसलिए मेरी नजर थी उसपर
पर हद ही कर दी इसबार वह
पूछती रही आजू -- बाजू सभी से
मना करने पर असभ्यता से पेश आयी ।

तभी, जब बहस मुझसे थी कर रही
अचानक दंडाधिकारी का हुआ प्रवेश
उनके हस्तक्षेप पर वह फिर
उलझ पड़ी उनसे भी ।

हश्र उसका देख
हूं मैं आहत
दोषी सब हैं इसके
पर दोष किसे दें?

क्या होगा इस देश का भविष्य ?
जब ऐसे बच्चे होंगे देश के कर्णधार?
सभी बच्चे ऐसे नहीं हैं मगर
हमारे समय तो एक भी ऐसे नहीं थे शायद....!
         
बड़ों का मान, शिक्षक का आदर
कहां गए ये संस्कार सारे ?
हम भी तो बच्चे थे कभी
इतनी असभ्यता हमने न दिखाई
       
कहां जा रही है यह पीढ़ी ?
     _____________

-- मधु रानी
20/03/2017

Saturday, 24 February 2018

सच कहूं तो...

बड़ी - बड़ी अच्छी बातें करते लोग,  बहुत देखे
पर इन पर अमल करने वाले लोग, बहुत कम देखे ।

रिश्तों को तोड़ने वाले लोग, बहुत देखे
इन्हें जोड़ने  वाले लोग, बहुत कम देखे ।

कर्तव्यनिष्ठा के हिमायती, बहुत देखे
पर इसकी कद्र करते लोग, बहुत कम देखे ।

गुणों को बखान ने वाले लोग, बहुत देखे
पर इन्हें अपनाने वाले लोग,  बहुत कम देखे ।

दोस्त बनाने वाले लोग, बहुत देखे दोस्ती निभाने वाले लोग, बहुत कम देखे ।

मीठी बातें करने वाले लोग, बहुत देखे
जीवन में मिठास घोलने वाले, बहुत कम देखे ।

खुशियां मनाने वाले लोग, बहुत देखे
 खुशियां बांटने वाले लोग, बहुत कम देखे ।

बच्चों की जिम्मेदारी निभाने वाले बहुत देखे
मां - बाप के साथ निबाहने वाले बहुत कम देखे

ईमान की बातें करते लोग, बहुत देखे
पर इमानदार बनते लोग,  बहुत कम देखे ।

सच कहूं तो.... अच्छी बातें सब करते हैं,
 फिर अच्छा बनने से लोग, क्यों कतराते हैं?

मधु रानी



Sunday, 24 December 2017

मन का सुख

आज कुछ लोगों से
हो गई मेरी बहस
विषय था – भ्रष्टाचार |
तीखा हो विषय ही जब
गर्मा – गर्मी तो होनी ही थी |
कहना था उनका,
‘कर’ तो हम भी देते हैं |
पर,
   कर देने के काबिल तो
   वो आज बने
इससे पूर्व तो चाहे
शिक्षण – संस्थान हो
या, न्युक्तियाँ,
प्रवेश तो पाया
अवैधानिकता अपना कर |
क्या धन के बल पर प्रवेश पाकर
नहीं किया योग्यता पर प्रहार ?
नहीं छीना योग्य उम्मीदवार का स्थान ?
बिना योग्यता, बिना परिश्रम,
धन के बल पर, बन बैठे अधिकारी
और इतराते आज ऐसे, जैसे
शेष सभी हैं निम्नतर |
दहेज़ की गाड़ी में घूमते
बड़ी – बड़ी बातें करते
योग्यता की धज्जी उड़ाते |
निम्न पद ही सही
पर,
योग्यता से, पाए लोगों पर
सदा अपनी धौंस जमाते  |
आता जाता कुछ न हो पर
खुद को शेर, औरों को बकरी बनाते |
हम कुछ तर्क दे न पाते
देश की कुव्यवस्था पर पछताते |
कैसे नींद आती है उनको
जो देश को बेच हैं खाते,
गलत रह पर चल कर, धन कमाते ?
भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे
कैसे हृदय गवारा करता,
मन – मस्तिष्क चैन है पता ?
बेहतर हैं वह, जो नेकी पर चलते
चैन की नींद और सुख से रहते |
मन -  मस्तिष्क को सुकून है ये
जो भी पाया अपने बल बूते |
गिरा किसी को – नहीं – जगह बनायी
अपनी योग्यता, मेहनत से पायी |
न पथभ्रष्ट बने, न भ्रष्ट पथ पर चले
न देश को बेचा, न पद ख़रीदा
न भोग किया, न विलास किया
न खौफ रहा, न डर किसी का
अभावों में जीकर भी जिसने
हर पल मन का सुख पाया |

                                           -- मधु रानी
                                           17-11-2016

Tuesday, 5 September 2017

शिक्षक हूँ …



शिक्षक हूँ
बच्चों को सभ्यता सिखाती हूँ
सभ्य समाज की नींव रखती हूँ
पर, स्वयं सम्मान की मोहताज़ हूँ |

शिक्षक हूँ
कुरीतियों को समाज से दूर करती हूँ
ज्ञान ही नहीं मनुष्यता भी सिखाती हूँ
पर समाज और मनुष्य के प्रेम की मोहताज हूँ |
कर्मठ हूँ
कर्म करती हूँ, बच्चों को सिखाती हूँ
कर्म करो फल की चिंता न करो
फल तो दूर, दो टूक प्रशंसा के शब्द की मोहताज़ हूँ |

शिक्षक हूँ
पढ़ाने – लिखाने के साथ, कागजातों – रिपोर्टों
खिलाने – पिलाने, की भी जिम्मेदारी निभाती हूँ
फिर भी कोई खुश नहीं, ख़ुशी पाने की मोहताज हूँ |

शिक्षक हूँ
दिन – भर शारीरिक – मानसिक श्रम करती हूँ
घर – बार, पति, बच्चे, सब त्याग, काम के बोझ तले दबी हूँ
एक साथ कई काम हैं, फुर्सत के दो पल की मोहताज हूँ |

शिक्षक हूँ
 पढ़ाना सिखाना काम है, पर हम है रसोइये भी,
ठेकेदार और राजमिस्त्री भी, चुनाव कराना और भी कई सैकड़ों काम हैं
इसमें पिसती अपने खोए अस्तित्व को पहचानने की मोहताज हूँ |

शिक्षक हूँ
अब सोचती हूँ, नाहक बनी शिक्षक
कुछ भी और बनना था, कोल्हू का बैल तो न बनती
क्या थी, क्या हो गई मैं, क्या बताऊँ किस – किस की मोहताज हूँ |

शिक्षक हूँ
भारत में, यही दोष है शायद
शेष सभी देशों में ये गत नहीं है शिक्षकों की
मान – सम्मान, पैसा, सब है वहाँ, शायद इसलिए
आज गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का मोहताज़ है देश |

शिक्षक हूँ
ईमानदारी से कर्म करती हूँ
देश के सपूतों को पैरों पर खड़ा करती हूँ
स्वयं भले अस्वस्थ हो, बैसाखी की मोहताज हूँ |
हमारे शिक्षक
भाग्यशाली थे, जिन्हें सिर्फ ज्ञान बाँटना होता था
विद्यालय सरस्वती का मंदिर था, अब तो होटल लगता है
सारे काम होते हैं, पर बच्चे शिक्षा के मोहताज हैं |
आज के शिक्षक
कोई व्यस्त है, भवन निर्माण कार्य में
कोई कागजातों में घुसे किरानी बने हैं
कोई भेजे गए चुनाव कराने तो
कोई व्यस्त है शौचालय और नल लगवाने में
क्या – क्या करे आखिर, और पढाएँ कब
फिर भी चाहिए उत्तम परीक्षा फल
कैसी व्यवस्था, जिसमें जीने के मोहताज़ हैं हम ?
-- मधु रानी
05-09-2017

03.00  am

Sunday, 27 August 2017

क़र्ज़

बचपन से जवानी
के दिन
कब बीते, कैसे बीते
पता न चला
जीवन के तीसरे पायदान पर
पाँव रखते ही
जब जीवन में
सन्नाटा है, उदासी है
तो लगा
कुछ पन्ने पलटूं
बीते जीवन के
एकाकीपन कुछ तो
होगा कम ---
जब अपने बचपन से लेकर
अपने बच्चों के बचपन तक
की यादों को समेटूंगी |
पुनर्स्मरण करने बैठी जब
आँखें मूंदे......
एक-एक कर यादें
आती जाती रहीं,
आपस में उलझती रहीं
चलचित्र की भाँती
कथाएं बुनती रहीं |
मैंने देखा.......
     कितनी निष्ठुर थी मैं,
     पिता से किया जिद,
     माँ से बेवजह बहस,
     भाइयों से झगड़े किये
     तो दोस्तों से नखरे
     सनकी थी मैं या उच्छृंखल
     व्यथित हुई मैं........
     कितना परेशान किया सभी को
     सबने कितना सहा है –
     मेरे कारण -- ?
     अब कैसे हूँ मैं
     इतनी सहज?
सच –
     एहसान बहुत हैं
     सबके मुझ पर
     कैसे मैं चुकाऊँ
     ये क़र्ज़ ???

n  मधु रानी

04/09/2016

Saturday, 17 June 2017

पिता



पिता वह शख्सियत है
कल्पना से ही जिसकी
जीवन में ----
उमंग, उत्साह और
उर्जा का ----
संचार होता है |
          उनके न होने का अहसास
          एक `हूक’ उठाती है
          दिल में
          टीस और दर्द के
          मर्म का ----
          फिर हिल्लोर आता है |
शत – शत नमन है
ऐ पिता तुम्हें,
जिन्होंने ----
अवलंबन बन कर
दृढ़ता से ----
सदा थाम रखा है |
          कभी छाँव, कभी जमीं
          कभी पूरा आकाश
          बनकर ----
          स्नेह – सिक्त हाथों से
          पल – पल ----
          मुझे दुलार जाता है |
खुदा आप हो मेरे
जहाँ आप हो मेरे
ये ख्याल ----
आज भी मेरी
किस्मत ----
सवाँर जाता है |


पितृ दिवस पर मेरे पूज्य पिताजी को समर्पित
                   -- मधु रानी
जून -2015

    

Saturday, 6 May 2017

अबोध मन की अभिलाषा


मातृ दिवस के अवसर पर…
On the occasion of Mothers' ​Day.



माँ,
      आ, पास बैठ ज़रा, दो – चार बातें कर लूँ – ज़रा | 
सान्निध्य तेरा पाने को ढूंढ रहा, वक्त थोड़ा
बचपन बीता जाता मेरा, कब होगा आलिंगन तेरा |
     आँचल में तेरे छिपना चाहूँ, पर फुर्सत कहाँ तुझको – मुझको
     तेरा काम बाधा डाले, मेरा काम मुझे रोके |
कैसे पाऊँ वो दुलार, जो मिला गोद में तेरी
अब तो दीवार समस्याओं की, जद्दोजहद – जीवन जीने की |
     पाऊँ कैसे ममता तेरी, स्नेह – सिक्त ह्रदय में,
     जो तू है संजोए, मेरे लिए |
तू थक कर सोई, मैं रात भर जागा,
लोरी बिना जब नींद न आई, तब तेरे आँचल में सोया |
     कितना करती है तू, माँ, केवल काम ही काम,
     काश ! मैं होता बड़ा, तुझको देता हरदम आराम |
पर, तब बचपन मेरा रीता रहता, तेरे लाड़ से अछूता रहता,

माँ,
    आ, पास बैठ जरा, दो – चार बातें कर लूँ – जरा |
तू जाती जब छोड़, मुझे अकेला, सहमा – सहमा रहता हूँ मैं
हर आहट पर तेरे आने की, भ्रम में जीता हूँ मैं |
     मेरा मन भी करता, मैं साथ चलूँ तेरे
     अपने नन्हें हाथों से जीवन में, कुछ रंग भरूँ तेरे |
वह भीनी – सोन्ही महक, जब तेरे आँचल से आती
सब्जी, मक्खन, कोयले और मसाले की |
     तब मंत्रमुग्ध हो जाता हूँ मैं ,
     सोंच – सोंच ये, तू आती होगी |
खूब खेलूँगा गोद में तेरी, तू चूमेगी माथा मेरा |
माँ,
    आ, पास बैठ जरा, दो – चार बातें कर लूँ – ज़रा |
    
-- मधु रानी

15-10-2015